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आवाराग़र्द है

कवि- पंकज तिवारी
स्वर- पंकज तिवारी
अक्षर- आवाराग़र्द
स्रोत- हिन्द-युग्म

2 Comments:

shobha said...

पंकज

अच्छी शुरुवात है । अपनी गज़ल अपने आप गाने का मज़ा ही कुछ और है । लेकिन गज़ल में अंग्रेजी के शब्द बहुत

अजीब लग रहे हैं । अगली गज़ल में ध्यान रखें । आवाज़ अच्छी है । प्रयास सराहनीय कहा जा सकता है ।

सस्नेह ।

8:33 AM

शैलेश भारतवासी said...

पहले शोभा जी का कंफ़्यूज़न दूर कर दूँ।



इस ग़ज़ल में कोई भी शब्द अंग्रेज़ी भाषा का नहीं है। एक शब्द है 'वाइज़' जो सुनने में अंग्रेज़ी जैसा लगता है लेकिन यह अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- नसीहत देने वाला, उपदेश देने वाला। यह शब्द ग़ज़लों में बहुतायत प्रयुक्त होता है।



अब पंकज जी से मुखातिब होता हूँ। पंकज जी धुन भी खुद सोचना और उतार-चढ़ाव खुद तय करना बहुत मुश्किल है, लेकिन आपने इस ग़ज़ल को एक अनुभवी गायक की तरह गाया है। कहीं-कहीं एकरसता नहीं है, वो बस अभ्यास से खत्म हो जायेगी।



हाँ, एक बात ज़रूर है, पता नहीं रिकार्डिंग की गुणवत्ता किस कारण बहुत बढ़िया नहीं है। लगता है आपने कॉर्डलेस माइक से रिकार्ड किया है। ज़रा ध्यान दीजिएगा।

9:27 AM

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