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कवि- रितू बन्सल
स्वर- विकास कुमार
अक्षर- काव्य-पल्लवन
स्रोत- हिन्द-युग्म
4 Comments:
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शैलेश भारतवासी
said...
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इसमें आपने सच्चे हिन्दी-प्रेमी का दर्द पिरोया है।
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विकास
said...
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मैंने नही, ये तो रितू जी की लेखनी है जिसने यह कमाल कर दिखाया है. :) धन्यवाद रितू जी!
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shobha
said...
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प्रिय विकास
तुमने सचमुच में कविता में जान डाल दी है । मैं भी यही मानती हूँ कि श्रेय तुमको ही जाता है ।
खुदा अच्छी कविता लिखवाए और तुम उसको अपना स्वर दो । बहुत-बहुत आशीर्वाद
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vikash
said...
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शोभा जी! आपका आशीर्वाद यूँ ही मिलता रहे, यही कामना है.
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