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कवि- शोभा महेन्द्रू
स्वर- विकास कुमार
अक्षर- काव्य-पल्लवन
स्रोत- हिन्द-युग्म
4 Comments:
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shobha
said...
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प्रिय विकास
तुमने तो कविता में जान डाल दी । कविता को इतने अच्छे ढ़ंग से पढ़ा ।
मेरे भावों को तुमने मुझसे भी अच्छा जाना । हिन्द युग्म को तुम्हारी आवाज़ एक वरदान है ।
तुम अपनी आवाज़ से हर कवि को जन-जन तक पहुँचाने की क्षमता रखते हो ।
बहुत-बहुत आशीर्वाद एवं हार्दिक बधाई ।
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vikash
said...
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धन्यवाद शोभा जी!
आपके प्रेरणापूर्ण आशीर्वाद से मैं अनुग्रहित हुआ. :)
कृपादृष्टि बनाये रखें.
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शैलेश भारतवासी
said...
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शोभा जी सहमत हूँ, आपने तो जान डाल दी है। एक-दो जगह उच्चारण की अशुद्धियाँ हैं। जैसे आपने 'ढ़' का उच्चारण ठीक से नहीं किया। 'ढूँढ़ना' में आप दूसरे 'ढ़' को 'ढ' बोल रहे थे। ध्यान दीजिएगा।
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विकास
said...
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शैलेश जी! गलतियोंं को इंगित करने के लिए धन्यवाद. आगे से सुधारने की कोशिश करूँगा. अगर आप सब इसी तरह स्नेह बनाये रखें तो एक दिन यह जड़मति भी सुजान बन ही जायेगा.
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