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कवि- प्रतिष्ठा शर्मा
स्वर- विकास कुमार
अक्षर- काव्य-पल्लवन
स्रोत- हिन्द-युग्म
3 Comments:
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pratishtha
said...
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विकास जी,
मुझे लगता था मेरी कवित मुझ से अछ्छी कोई नहीं पढ सकता। पर आपका जवाब नहीं, आप ने तो कवीता मैं जान ङाल दी। बहुत खूब।
प्रतिष्ठा
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Hind-Yugm
said...
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धन्यवाद प्रतिष्ठा जी!
-- विकास
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शैलेश भारतवासी
said...
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जब इसे पढ़ा था तो कम प्रभावित हुआ था, लेकिन आपने तो बहुत असरदार तरीके से सुनाया। अच्छा लगा।
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