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कवि- गौरव सोलंकी
स्वर- शैलेश भारतवासी
अक्षर- पिता से
स्रोत- हिन्द-युग्म
2 Comments:
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shobha
said...
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गौरव सोलंकी की यह कविता मुझे बहुत पसन्द आयी थी ।
मैं भी इसको अपना स्वर देना चाहती थी। आज तुम्हारी आवाज़
में इसे सुनकर बहुत अच्छा लगा । कविता तो अच्छी थी ही
तुमने इसे भाव-पूर्ण शब्दों में पढ़ा है तथा और भी सुन्दर बना दिया ।
बधाई
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तपन शर्मा
said...
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जितने प्रभावशाली शब्द हैं उतनी ही असरदार आवाज़.. बोल सुनकर आँखें नम हो गईं..
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